Sunday, August 19, 2018

दिन दिन काट रहे हैं
टुकड़ा टुकड़ा ज़िन्दगी कर्जदारों में बाँट रहे हैं
गुज़रते सालों में साँसों के मायने
तिनका तिनका छाँट रहे हैं

कुछ ठहरे, कई गुज़रे
रेत की आरामगाह के मुसाफ़िर
चंद लम्हों की कितनी रेज़गारी
जाते जाते आंक रहे हैं

शाम से बदलती रात
बुझी हुई लालटेन का वही सवाल
ठंडे पसीने की आखरी बूँदे
बुझती लौ को ताक रहे हैं

Tuesday, July 31, 2018

कभी जो मैं कह ना पाऊँ

कि जिस रात तुम्हारे जिस्म की गर्मी महसूस नहीं होती
उस रात काफी सर्द सोता हूँ

जिस सफ़र में तुम्हारा हाथ नहीं थामता
उस मंज़िल तक पहुँच कर भी खोया रहता हूँ

जिस नज़र में तुम्हारा अक्स नहीं दिखता
उस जलसे में भी मायूस होता हूँ

जिस जन्नत में तुम्हारा नूर न बरसे 
उस रोशन में भी सियाह होता हूँ

कभी जो मैं कह ना पाऊँ

कि इस ज़िन्दगी की तमाम बेमानियों में
तुम्हारे होने से मैं होता हूँ