Friday, November 29, 2013

तीसरा इत्तेफ़ाक़


शाम की उम्मीद को खिड़की से आते देखा
       मुमकिन है ये मुलाकात मुकम्मल हो जाये
पिछली बार तो परछाई भी छू न पाया
        और शहर में बेहयाई का चर्चा हो गया

कुछ तो सोच रहे थे गुज़री शब्
       सांस थोड़ी तेज़, बाल थोड़े बिखरे
जी भर देख तो मैं भी ना पाया
       हाँ उन्स से अकीदत का सफ़र कुछ और तय हो गया

उस लम्हा जब रौशनी तुमसे टकरायी थी
      और पिघल के मेरी आँखों में समां गयी थी
रूह को इत्मीनान तो न हो पाया
      हाँ ज़िन्दगी को एक मौका मुक़र्रर हो गया

Wednesday, November 27, 2013

शमशान

दरख़्त कि छाल पर एक एहसास छुपा  आया हूँ
         तेरे नाम के नीचे एक काश दबा आया हूँ
पिछली महफ़िल की दराज़ों से कुछ धुंधला था
         तेरे रक्स कि खरोचे उन काफिरो से मांग लाया हूँ

सुन्न सन्नाटे में सुई घोप के देख रहा था
         रिसता हुआ खून लाल ही था
झुलसती आग कि तड़पन को पूरा करने
उस जिस्म को शमशान छोड़ आया हूँ

Saturday, November 2, 2013

अमीसी

कुछ अरसा गुज़रने को है
        बात अभी अधूरी सी है
पेरिस की नदी में संदूक की चाभी
        सर्द कब्र में दफ़न सी है
साहिल पे सूरज ढलने को है
        राहें लम्बी, रात बुझी सी है
उजले रास्तो पे हाथ थामे
       मेरे जिस्म पे तेरी सांस की महक सी है
दलान में जलती अंगीठी, सिर्फ एक शॉल
       वो याद आज भी अमीसी है