कभी जो मैं कह ना पाऊँ
कि जिस रात तुम्हारे जिस्म की गर्मी महसूस नहीं होती
उस रात काफी सर्द सोता हूँ
जिस सफ़र में तुम्हारा हाथ नहीं थामता
उस मंज़िल तक पहुँच कर भी खोया रहता हूँ
जिस नज़र में तुम्हारा अक्स नहीं दिखता
उस जलसे में भी मायूस होता हूँ
जिस जन्नत में तुम्हारा नूर न बरसे
उस रोशन में भी सियाह होता हूँ
कभी जो मैं कह ना पाऊँ
कि इस ज़िन्दगी की तमाम बेमानियों में
तुम्हारे होने से मैं होता हूँ
कि जिस रात तुम्हारे जिस्म की गर्मी महसूस नहीं होती
उस रात काफी सर्द सोता हूँ
जिस सफ़र में तुम्हारा हाथ नहीं थामता
उस मंज़िल तक पहुँच कर भी खोया रहता हूँ
जिस नज़र में तुम्हारा अक्स नहीं दिखता
उस जलसे में भी मायूस होता हूँ
जिस जन्नत में तुम्हारा नूर न बरसे
उस रोशन में भी सियाह होता हूँ
कभी जो मैं कह ना पाऊँ
कि इस ज़िन्दगी की तमाम बेमानियों में
तुम्हारे होने से मैं होता हूँ