Wednesday, December 29, 2010
एक लड़की
कुछ दूर कुछ पास हो
दूर क्षितिज पे ढलते सूरज सी
कुछ पीली कुछ लाल हो
झरने के निनाद सी
कुछ अल्हड़ कुछ संजीदा हो
खुद अपनी हंसी सी
कुछ प्रत्यक्ष कुछ पोशीदा हो
भीगे बदन पे लगती धूप सी
कुछ ठंडी कुछ गर्म हो
सर्दी में अलाव की आग सी
कुछ कठोर कुछ नर्म हो
इस समय की स्नेहिल यादें संजोये
हर लम्हा एक नया एहसास हो
Saturday, July 31, 2010
यूँ होता तो कैसा होता
एक नया रास्ता देखा था कल रात
सोचता हूँ देख आऊं उस पार क्या है
शायद कोई परछाई जानी पहचानी मिल जाये
चेहरे तो सभी अनजाने हैं
पिछले साल या शायद उससे भी पहले
तुम्हारी याद तो आती थी
पर अब हर शाम नम तो है मगर
एक तीस के अलावा कुछ नहीं
तुम्हे पहचान तो लूँगा
चेहरे क्या बहुत बदलते हैं ?
लेकिन उन झुर्रियों के पीछे वो हंसी
मुमकिन है पहले जैसी न हो
यूँ होता तो कैसा होता
मै कहता और तुम सुनती
कुछ पल तो साथ चलते
और उम्र गुज़र जाती
Saturday, July 17, 2010
आज तुमसे कह देता हूँ
हाँ एक अरसे से कहना ही तो चाहता हूँ
जैसे ज़िन्दगी का वो पन्ना जिसे फाड़ने पर पूरी किताब बेमानी हो जाती है
जैसे तुम्हारा वजूद रहता है मेरे साथ, साँस बनकर
की इस चिलचिलाती धूप में तुम्हारा चेहरा ऐसा लगता है
जैसे माहताब में उमड़ती हुई लहरें
की इस अजनबी से शोर में तुम्हारे शब्द ऐसे लगते हैं
जैसे अलसाई सी सुबह की अंगड़ाई
की इस खाली से बिस्तर पे तुम्हारा जिस्म ऐसा लगता है
जैसे जनवरी की धूप की तपिश
की इस बेमानी सी ज़िन्दगी में तुम्हारा होना ऐसा लगता है
जैसे एक मुकाम जिसे मैं कबसे ढूँढ रहा था
हाँ एक अरसे से कहना ही तो चाहता हूँ
और जब तुम होती हो तो धुंध की चादर सी सफ़ेद अनछुई
डरता हूँ तुम्हे मैला न कर दूँ