Saturday, July 31, 2010

यूँ होता तो कैसा होता

आज शाम भी अकेला हूँ
एक नया रास्ता देखा था कल रात
सोचता हूँ देख आऊं उस पार क्या है
शायद कोई परछाई जानी पहचानी मिल जाये
चेहरे तो सभी अनजाने हैं

पिछले साल या शायद उससे भी पहले
तुम्हारी याद तो आती थी
पर अब हर शाम नम तो है मगर
एक तीस के अलावा कुछ नहीं

तुम्हे पहचान तो लूँगा
चेहरे क्या बहुत बदलते हैं ?
लेकिन उन झुर्रियों के पीछे वो हंसी
मुमकिन है पहले जैसी न हो

यूँ होता तो कैसा होता
मै कहता और तुम सुनती
कुछ पल तो साथ चलते
और उम्र गुज़र जाती