Sunday, August 19, 2018

दिन दिन काट रहे हैं
टुकड़ा टुकड़ा ज़िन्दगी कर्जदारों में बाँट रहे हैं
गुज़रते सालों में साँसों के मायने
तिनका तिनका छाँट रहे हैं

कुछ ठहरे, कई गुज़रे
रेत की आरामगाह के मुसाफ़िर
चंद लम्हों की कितनी रेज़गारी
जाते जाते आंक रहे हैं

शाम से बदलती रात
बुझी हुई लालटेन का वही सवाल
ठंडे पसीने की आखरी बूँदे
बुझती लौ को ताक रहे हैं