दरख़्त कि छाल पर एक एहसास छुपा आया हूँ
तेरे नाम के नीचे एक काश दबा आया हूँ
पिछली महफ़िल की दराज़ों से कुछ धुंधला था
तेरे रक्स कि खरोचे उन काफिरो से मांग लाया हूँ
सुन्न सन्नाटे में सुई घोप के देख रहा था
रिसता हुआ खून लाल ही था
झुलसती आग कि तड़पन को पूरा करने
उस जिस्म को शमशान छोड़ आया हूँ
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