कुछ अरसा गुज़रने को है
बात अभी अधूरी सी है
पेरिस की नदी में संदूक की चाभी
सर्द कब्र में दफ़न सी है
साहिल पे सूरज ढलने को है
राहें लम्बी, रात बुझी सी है
उजले रास्तो पे हाथ थामे
मेरे जिस्म पे तेरी सांस की महक सी है
दलान में जलती अंगीठी, सिर्फ एक शॉल
वो याद आज भी अमीसी है
बात अभी अधूरी सी है
पेरिस की नदी में संदूक की चाभी
सर्द कब्र में दफ़न सी है
साहिल पे सूरज ढलने को है
राहें लम्बी, रात बुझी सी है
उजले रास्तो पे हाथ थामे
मेरे जिस्म पे तेरी सांस की महक सी है
दलान में जलती अंगीठी, सिर्फ एक शॉल
वो याद आज भी अमीसी है
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