Saturday, November 2, 2013

अमीसी

कुछ अरसा गुज़रने को है
        बात अभी अधूरी सी है
पेरिस की नदी में संदूक की चाभी
        सर्द कब्र में दफ़न सी है
साहिल पे सूरज ढलने को है
        राहें लम्बी, रात बुझी सी है
उजले रास्तो पे हाथ थामे
       मेरे जिस्म पे तेरी सांस की महक सी है
दलान में जलती अंगीठी, सिर्फ एक शॉल
       वो याद आज भी अमीसी है 

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