Thursday, October 31, 2013

ज़िन्दगी

आज उम्मीदों के पंख लगा उड़ लेने दो
         आज हक़ीक़तों से परे हूँ मैं
आज तेरा हाथ थाम कुछ दूर चल लेने दो
         आज बैसाखियों से परे हूँ मैं
आज तेरे माथे का चाँद चूम लेने दो
         आज शर्म हया से परे हूँ मैं
आज दरिया-इ-इश्क़ में डूब जाने दो
         आज मौत से परे हूँ मैं
आज बेपरवाह भावनाओ में बहने दो
        कल के हमारे सच से परे हूँ मैं
आज मजबूर दिल को मेरे होने दो
         कल कि शर्मिंदगी से परे हूँ मैं
आज तेरी चाहतो कि छाँव में दो पल गुज़ार लेने दो
          कल की निर्दयी धूप से परे हूँ मैं
आज तेरी आँखों में फना हो जाने दो
          कल की तनहा ज़िन्दगी से परे हूँ मैं 

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