एक कतरा इश्क था, तेरा क़र्ज़ था
पर खामोश, खुदगर्ज़ था
लम्हों की सुराही में तमाम कतरे बटोर लेते
कुछ को संजोते, कुछ फ़ना हो जाते
खामोश शामो में तुझे कुछ सुनाते
हर आहट पे मुड़ के तुझे ही पाते
खुदगर्जी नहीं, मेरे रूह की हया थी
जो तुम देख पाते, जो तुम देख पाते
पर खामोश, खुदगर्ज़ था
लम्हों की सुराही में तमाम कतरे बटोर लेते
कुछ को संजोते, कुछ फ़ना हो जाते
खामोश शामो में तुझे कुछ सुनाते
हर आहट पे मुड़ के तुझे ही पाते
खुदगर्जी नहीं, मेरे रूह की हया थी
जो तुम देख पाते, जो तुम देख पाते
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