कुछ इस तरह की होगी
की गर्म कोट में लिपटी, फिर भी ठिठुरती
की भूरी आँखों के बीच वो बिंदी अठखेलिया करती
की चेहरे पे वो लट कभी उलझती कभी संवरती
की मुस्कुराहटे तमाम बदमाशियां करती
की चलती, सोचने तो थम जाती और फिर पलटती
की भाव भंगिमाओ से सबको छलती
की बिखरते रेशम सी, कुछ हमवार, कुछ सिलवटी
हाँ, कुछ ऐसी ही होगी
की गर्म कोट में लिपटी, फिर भी ठिठुरती
की भूरी आँखों के बीच वो बिंदी अठखेलिया करती
की चेहरे पे वो लट कभी उलझती कभी संवरती
की मुस्कुराहटे तमाम बदमाशियां करती
की चलती, सोचने तो थम जाती और फिर पलटती
की भाव भंगिमाओ से सबको छलती
की बिखरते रेशम सी, कुछ हमवार, कुछ सिलवटी
हाँ, कुछ ऐसी ही होगी
No comments:
Post a Comment