Friday, November 29, 2013

तीसरा इत्तेफ़ाक़


शाम की उम्मीद को खिड़की से आते देखा
       मुमकिन है ये मुलाकात मुकम्मल हो जाये
पिछली बार तो परछाई भी छू न पाया
        और शहर में बेहयाई का चर्चा हो गया

कुछ तो सोच रहे थे गुज़री शब्
       सांस थोड़ी तेज़, बाल थोड़े बिखरे
जी भर देख तो मैं भी ना पाया
       हाँ उन्स से अकीदत का सफ़र कुछ और तय हो गया

उस लम्हा जब रौशनी तुमसे टकरायी थी
      और पिघल के मेरी आँखों में समां गयी थी
रूह को इत्मीनान तो न हो पाया
      हाँ ज़िन्दगी को एक मौका मुक़र्रर हो गया

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