Thursday, March 27, 2014

फिर

फिर चल मेरे साथ, उस ज़मीन पर,
ढलते सूरज की लाल रौशनी जहाँ
तेरे चेहरे में सिमट कर ज़ार हुआ करती थी
फिर चल मेरे साथ, उस दरख़्त के नीचे,
छाल पे लिखा मेरा नाम जहाँ
तेरे नाम कि गोद में खामोश सोया करता था
फिर चल मेरे साथ, उस नीलम दरिया किनारे
धनक का सतरंगी नूर जहाँ
घुमड़ते बादलो से छना करता था
फिर चल मेरे साथ, उस खामोश कमरे में
मेरी चढ़ती उतरती साँसे जहाँ
तेरे जिस्म से टकरा कर परवान चढ़ा करती थी

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