आज तुमसे कह देता हूँ
हाँ एक अरसे से कहना ही तो चाहता हूँ
जैसे ज़िन्दगी का वो पन्ना जिसे फाड़ने पर पूरी किताब बेमानी हो जाती है
जैसे तुम्हारा वजूद रहता है मेरे साथ, साँस बनकर
की इस चिलचिलाती धूप में तुम्हारा चेहरा ऐसा लगता है
जैसे माहताब में उमड़ती हुई लहरें
की इस अजनबी से शोर में तुम्हारे शब्द ऐसे लगते हैं
जैसे अलसाई सी सुबह की अंगड़ाई
की इस खाली से बिस्तर पे तुम्हारा जिस्म ऐसा लगता है
जैसे जनवरी की धूप की तपिश
की इस बेमानी सी ज़िन्दगी में तुम्हारा होना ऐसा लगता है
जैसे एक मुकाम जिसे मैं कबसे ढूँढ रहा था
हाँ एक अरसे से कहना ही तो चाहता हूँ
और जब तुम होती हो तो धुंध की चादर सी सफ़ेद अनछुई
डरता हूँ तुम्हे मैला न कर दूँ
5 comments:
!!!
Waah, irshaad apoorv dost. Pity that your inspiration was a menial committe task rather than abeautiful ghost of woman whom you seem to be describing.
i published it for the committee task!! but the inspiration is pretty much a woman !!!!
feel like borrowing Ghalib:
हमसे शिकायत की भी बाकी न रहे जगह
सुन लेते हैं गोया जिक्र हमारा नहीं करते
ग़ालिब तेरा अहवाल सुना देंगे हम उनको
वह सुन के बुला लेंगे यह इजारा नहीं करते
...que si ma supposition sur elle était correcte!!
(about) La Belle Dame Sans Merci.. hélas mon ami!!!
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