Saturday, July 17, 2010

आज तुमसे कह देता हूँ

हाँ एक अरसे से कहना ही तो चाहता हूँ

की तमाम कोशिशों के बाद भी तुम्हे अजनबी नहीं बना पाया हूँ मैं

जैसे ज़िन्दगी का वो पन्ना जिसे फाड़ने पर पूरी किताब बेमानी हो जाती है

की अनजाने में तुमने जो दस्तक दी है उसे हर लम्हा सुन सकता हूँ मैं

जैसे तुम्हारा वजूद रहता है मेरे साथ, साँस बनकर

की इस चिलचिलाती धूप में तुम्हारा चेहरा ऐसा लगता है

जैसे माहताब में उमड़ती हुई लहरें

की इस अजनबी से शोर में तुम्हारे शब्द ऐसे लगते हैं

जैसे अलसाई सी सुबह की अंगड़ाई

की इस खाली से बिस्तर पे तुम्हारा जिस्म ऐसा लगता है

जैसे जनवरी की धूप की तपिश

की इस बेमानी सी ज़िन्दगी में तुम्हारा होना ऐसा लगता है

जैसे एक मुकाम जिसे मैं कबसे ढूँढ रहा था

आज तुमसे कह देता हूँ

हाँ एक अरसे से कहना ही तो चाहता हूँ

पर जब शब्द मिलते हैं तो तुम नहीं होती

और जब तुम होती हो तो धुंध की चादर सी सफ़ेद अनछुई

डरता हूँ तुम्हे मैला कर दूँ

5 comments:

Nanga Fakir said...

!!!

Unknown said...

Waah, irshaad apoorv dost. Pity that your inspiration was a menial committe task rather than abeautiful ghost of woman whom you seem to be describing.

brahmasmi said...

i published it for the committee task!! but the inspiration is pretty much a woman !!!!

Anupama said...
This comment has been removed by a blog administrator.
rityusha said...

feel like borrowing Ghalib:
हमसे शिकायत की भी बाकी न रहे जगह
सुन लेते हैं गोया जिक्र हमारा नहीं करते

ग़ालिब तेरा अहवाल सुना देंगे हम उनको
वह सुन के बुला लेंगे यह इजारा नहीं करते


...que si ma supposition sur elle était correcte!!
(about) La Belle Dame Sans Merci.. hélas mon ami!!!